Tue. Sep 27th, 2022

संस्कृत श्लोक में इसके बारे में यह कहा गया है कि ‘अतति सततं गच्छाति इति अतसी’ अर्थात् मीठे गुणों को धारण करने वाले इस पौधे को अतसी कहते हैं । क्योंकि इसके फूल नीले होते हैं इसलिये इसे नील पुष्पी भी कहा जाता है । यह भारत का आदिवासी पौधा है ।
इसके फूल पार्वती जी को पसन्द थे । इसलिये उसे उमा पुष्पी भी कहा जाता है । पुष्पकाल-फरवरी, मार्च | फलकाल-जून, जुलाई । प्रयोज्य अंग-बीज, बीज़ चूर्ण 3 से 6 ग्राम ।

लाभ

  • पके हुए व्रणभेदन के लिये इसको कूटकर लेप करने से काफी लाभ होता है ।
  • वातप्रधान व्रण में वेदना तथा कष्ट होने पर इसका तेल लगाने से लाभ होता है ।
  • इसका प्रयोग पेचिश रोकने के लिये भी किया जाता है ।
  • अलसी के तेल तथा चूने के पानी से तैयार किया हुआ मलहम जले हुये स्थान पर लगाने से जलन ठीक होता है । गन्धक के साथ यह तेल त्वचा विकार में उपयोगी है ।
  • वायु के दर्द से मुक्ति पाने के लिये अलसी का तेल लगाने से आराम होता है ।

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